श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.20.35

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

या वा काचित्त्वमबले दिष्ट्या सन्दर्शनं तव।

उत्सुनोषीक्षमाणानां कन्दुकक्रीडया मनः॥ ३५

yā vā kācittvamabale diṣṭyā sandarśanaṃ tava|

utsunoṣīkṣamāṇānāṃ kandukakrīḍayā manaḥ|| 35

अर्थ

अबले! तुम कोई भी क्यों न हो, हमें तुम्हारा दर्शन हुआ—यह बड़े सौभाग्यकी बात है। तुम अपनी गेंद उछाल-उछालकर तो हम दर्शकोंके मनको मथे डालती हो॥ ३५॥

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