अबले! तुम कोई भी क्यों न हो, हमें तुम्हारा दर्शन हुआ—यह बड़े सौभाग्यकी बात है। तुम अपनी गेंद उछाल-उछालकर तो हम दर्शकोंके मनको मथे डालती हो॥ ३५॥
या वा काचित्त्वमबले दिष्ट्या सन्दर्शनं तव।
उत्सुनोषीक्षमाणानां कन्दुकक्रीडया मनः॥ ३५
अबले! तुम कोई भी क्यों न हो, हमें तुम्हारा दर्शन हुआ—यह बड़े सौभाग्यकी बात है। तुम अपनी गेंद उछाल-उछालकर तो हम दर्शकोंके मनको मथे डालती हो॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.20.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 332) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/20/35/