तदनन्तर ब्रह्माजीने गम्भीर भावसे हँसकर अपनी कान्तिमयी मूर्तिसे, जो अपने सौन्दर्यका मानो आप ही आस्वादन करती थी, गन्धर्व और अप्सराओंको उत्पन्न किया॥ ३८॥
प्रहस्य भावगम्भीरं जिघ्रन्त्यात्मानमात्मना।
कान्त्या ससर्ज भगवान् गन्धर्वाप्सरसां गणान्॥ ३८
तदनन्तर ब्रह्माजीने गम्भीर भावसे हँसकर अपनी कान्तिमयी मूर्तिसे, जो अपने सौन्दर्यका मानो आप ही आस्वादन करती थी, गन्धर्व और अप्सराओंको उत्पन्न किया॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.20.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 333) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/20/38/