तीर्थसेवनसे उनका अन्तःकरण और भी शुद्ध हो गया था। उन्होंने कुशावर्त्तक्षेत्र (हरिद्वार) में बैठे हुए तत्त्वज्ञानियोंमें श्रेष्ठ मैत्रेयजीके पास जाकर और क्या पूछा?॥ ४॥✎ 291
किमन्वपृच्छन्मैत्रेयं विरजास्तीर्थसेवया।
उपगम्य कुशावर्त आसीनं तत्त्ववित्तमम्॥ ४
तीर्थसेवनसे उनका अन्तःकरण और भी शुद्ध हो गया था। उन्होंने कुशावर्त्तक्षेत्र (हरिद्वार) में बैठे हुए तत्त्वज्ञानियोंमें श्रेष्ठ मैत्रेयजीके पास जाकर और क्या पूछा?॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.20.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 329) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/20/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)