श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.21.27

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

आत्मजामसितापांगीं वयःशीलगुणान्विताम्।

मृगयन्तीं पतिं दास्यत्यनुरूपाय ते प्रभो॥ २७

ātmajāmasitāpāṃgīṃ vayaḥśīlaguṇānvitām|

mṛgayantīṃ patiṃ dāsyatyanurūpāya te prabho|| 27

अर्थ

उनकी एक रूप-यौवन, शील और गुणोंसे सम्पन्‍न श्यामलोचना कन्या इस समय विवाहके योग्य है। प्रजापते! तुम सर्वथा उसके योग्य हो, इसलिये वे तुम्हींको वह कन्या अर्पण करेंगे॥ २७॥

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