श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.21.45

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

प्रविश्य तत्तीर्थवरमादिराजः सहात्मजः।

ददर्श मुनिमासीनं तस्मिन् हुतहुताशनम्॥ ४५

praviśya tattīrthavaramādirājaḥ sahātmajaḥ|

dadarśa munimāsīnaṃ tasmin hutahutāśanam|| 45

अर्थ

आदिराज महाराज मनुने उस उत्तम तीर्थमें कन्याके सहित पहुँचकर देखा कि मुनिवर कर्दम अग्‍निहोत्रसे निवृत्त होकर बैठे हुए हैं॥ ४५॥ बहुत दिनोंतक उग्र तपस्या करनेके कारण वे शरीरसे बड़े तेजस्वी दीख पड़ते थे तथा भगवान्‌के स्नेहपूर्ण चितवनके दर्शन और उनके उच्चारण किये हुए कर्णामृतरूप सुमधुर वचनोंको सुननेसे, इतने दिनोंतक तपस्या करनेपर भी वे विशेष दुर्बल नहीं जान पड़ते थे ॥ ४६॥ उनका शरीर लम्बा था, नेत्र कमलदलके समान विशाल और मनोहर थे, सिरपर जटाएँ सुशोभित थीं और कमरमें चीर-वस्त्र थे। वे निकटसे देखनेपर बिना सानपर चढ़ी हुई महामूल्य मणिके समान मलिन जान पड़ते थे॥ ४७॥

यह व्याख्या श्लोक 3.21.45 से 3.21.47 तककी एक साथ है।

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