श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.21.46

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

विद्योतमानं वपुषा तपस्युग्रयुजा चिरम्।

नातिक्षामं भगवतः स्निग्धापांगावलोकनात्।

तद‍्व्याहृतामृतकलापीयूषश्रवणेन च॥ ४६

vidyotamānaṃ vapuṣā tapasyugrayujā ciram|

nātikṣāmaṃ bhagavataḥ snigdhāpāṃgāvalokanāt|

tadvyāhṛtāmṛtakalāpīyūṣaśravaṇena ca|| 46

अर्थ

बहुत दिनोंतक उग्र तपस्या करनेके कारण वे शरीरसे बड़े तेजस्वी दीख पड़ते थे तथा भगवान्‌के स्नेहपूर्ण चितवनके दर्शन और उनके उच्चारण किये हुए कर्णामृतरूप सुमधुर वचनोंको सुननेसे, इतने दिनोंतक तपस्या करनेपर भी वे विशेष दुर्बल नहीं जान पड़ते थे ॥ ४६॥

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