महाराज स्वायम्भुव मनुको अपनी कुटीमें आकर प्रणाम करते देख उन्होंने उन्हें आशीर्वादसे प्रसन्न किया और यथोचित आतिथ्यकी रीतिसे उनका स्वागत-सत्कार किया॥ ४८॥
अथोटजमुपायातं नृदेवं प्रणतं पुरः।
सपर्यया पर्यगृह्णात्प्रतिनन्द्यानुरूपया॥ ४८
महाराज स्वायम्भुव मनुको अपनी कुटीमें आकर प्रणाम करते देख उन्होंने उन्हें आशीर्वादसे प्रसन्न किया और यथोचित आतिथ्यकी रीतिसे उनका स्वागत-सत्कार किया॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.21.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 340) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/21/48/