श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.22.10

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

यदा तु भवतः शीलश्रुतरूपवयोगुणान्।

अशृणोन्‍नारदादेषा त्वय्यासीत्कृतनिश्‍चया॥ १०✎ 1884

yadā tu bhavataḥ śīlaśrutarūpavayoguṇān|

aśṛṇonnāradādeṣā tvayyāsītkṛtaniścayā|| 10

अर्थ

जबसे इसने नारदजीके मुखसे आपके शील, विद्या, रूप, आयु और गुणोंका वर्णन सुना है तभीसे यह आपको अपना पति बनानेका निश्‍चय कर चुकी है॥ १०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1884 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): त्यय्यासीत् → त्वय्यासीत्

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