श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.22.9

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

प्रियव्रतोत्तानपदोः स्वसेयं दुहिता मम।

अन्विच्छति पतिं युक्तं वयः शीलगुणादिभिः॥ ९

priyavratottānapadoḥ svaseyaṃ duhitā mama|

anvicchati patiṃ yuktaṃ vayaḥ śīlaguṇādibhiḥ|| 9

अर्थ

यह मेरी कन्या—जो प्रियव्रत और उत्तानपादकी बहिन है—अवस्था, शील और गुण आदिमें अपने योग्य पतिको पानेकी इच्छा रखती है॥ ९॥

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