श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.22.34

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

निष्णातं योगमायासु मुनिं स्वायम्भुवं मनुम्।

यदा भ्रंशयितुं भोगा न शेकुर्भगवत्परम्॥ ३४

niṣṇātaṃ yogamāyāsu muniṃ svāyambhuvaṃ manum|

yadā bhraṃśayituṃ bhogā na śekurbhagavatparam|| 34

अर्थ

वे इच्छानुसार भोगोंका निर्माण करनेमें कुशल थे; किन्तु मननशील और भगवत्परायण होनेके कारण भोग उन्हें किंचित् भी विचलित नहीं कर पाते थे॥ ३४॥

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