श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.22.35

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

अयातयामास्तस्यासन् यामाः स्वान्तरयापनाः।

शृण्वतो ध्यायतो विष्णोः कुर्वतो ब्रुवतः कथाः॥ ३५

ayātayāmāstasyāsan yāmāḥ svāntarayāpanāḥ|

śṛṇvato dhyāyato viṣṇoḥ kurvato bruvataḥ kathāḥ|| 35

अर्थ

भगवान् विष्णुकी कथाओंका श्रवण, ध्यान, रचना और निरूपण करते रहनेके कारण उनके मन्वन्तरको व्यतीत करनेवाले क्षण कभी व्यर्थ नहीं जाते थे॥ ३५॥

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