श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.22.38

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

यः पृष्टो मुनिभिः प्राह धर्मान्‍नानाविधाञ्छुभान्।

नृणां वर्णाश्रमाणां च सर्वभूतहितः सदा॥ ३८

yaḥ pṛṣṭo munibhiḥ prāha dharmānnānāvidhāñchubhān|

nṛṇāṃ varṇāśramāṇāṃ ca sarvabhūtahitaḥ sadā|| 38

अर्थ

मनुजी निरन्तर समस्त प्राणियोंके हितमें लगे रहते थे। मुनियोंके पूछनेपर उन्होंने मनुष्योंके तथा समस्त वर्ण और आश्रमोंके अनेक प्रकारके मंगलमय धर्मोंका भी वर्णन किया (जो मनुसंहिताके रूपमें अब भी उपलब्ध है)॥ ३८॥

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