श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.22.4

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

अतो ह्यन्योन्यमात्मानं ब्रह्म क्षत्रं च रक्षतः।

रक्षति स्माव्ययो देवः स यः सदसदात्मकः॥ ४

ato hyanyonyamātmānaṃ brahma kṣatraṃ ca rakṣataḥ|

rakṣati smāvyayo devaḥ sa yaḥ sadasadātmakaḥ|| 4

अर्थ

अतः एक ही शरीरसे सम्बद्ध होनेके कारण अपनी-अपनी और एक-दूसरेकी रक्षा करनेवाले उन ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी वास्तवमें श्रीहरि ही रक्षा करते हैं जो समस्त कार्यकारणरूप होकर भी वास्तवमें निर्विकार हैं॥ ४॥

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