श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.22.5

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

तव सन्दर्शनादेव च्छिन्‍ना मे सर्वसंशयाः।

यत्स्वयं भगवान् प्रीत्या धर्ममाह रिरक्षिषोः॥ ५

tava sandarśanādeva cchinnā me sarvasaṃśayāḥ|

yatsvayaṃ bhagavān prītyā dharmamāha rirakṣiṣoḥ|| 5

अर्थ

आपके दर्शनमात्रसे ही मेरे सारे सन्देह दूर हो गये, क्योंकि आपने मेरी प्रशंसाके मिससे स्वयं ही प्रजापालनकी इच्छावाले राजाके धर्मोंका बड़े प्रेमसे निरूपण किया है॥ ५॥

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