आपके दर्शनमात्रसे ही मेरे सारे सन्देह दूर हो गये, क्योंकि आपने मेरी प्रशंसाके मिससे स्वयं ही प्रजापालनकी इच्छावाले राजाके धर्मोंका बड़े प्रेमसे निरूपण किया है॥ ५॥
तव सन्दर्शनादेव च्छिन्ना मे सर्वसंशयाः।
यत्स्वयं भगवान् प्रीत्या धर्ममाह रिरक्षिषोः॥ ५
आपके दर्शनमात्रसे ही मेरे सारे सन्देह दूर हो गये, क्योंकि आपने मेरी प्रशंसाके मिससे स्वयं ही प्रजापालनकी इच्छावाले राजाके धर्मोंका बड़े प्रेमसे निरूपण किया है॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.22.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 341) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/22/5/