श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.22.6

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

दिष्ट्या मे भगवान् दृष्टो दुर्दर्शो योऽकृतात्मनाम्।

दिष्ट्या पादरजः स्पृष्टं शीर्ष्णा मे भवतः शिवम्॥ ६

diṣṭyā me bhagavān dṛṣṭo durdarśo yo'kṛtātmanām|

diṣṭyā pādarajaḥ spṛṣṭaṃ śīrṣṇā me bhavataḥ śivam|| 6

अर्थ

आपका दर्शन अजितेन्द्रिय पुरुषोंको बहुत दुर्लभ है; मेरा बड़ा भाग्य है जो मुझे आपका दर्शन हुआ और मैं आपके चरणोंकी मंगलमयी रज अपने सिरपर चढ़ा सका॥ ६॥

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