श्रीमैत्रेयजीने कहा—विदुरजी! माता-पिताके चले जानेपर पतिके अभिप्रायको समझ लेनेमें कुशल साध्वी देवहूति कर्दमजीकी प्रतिदिन प्रेमपूर्वक सेवा करने लगी, ठीक उसी तरह, जैसे श्रीपार्वतीजी भगवान् शंकरकी सेवा करती हैं॥ १॥✎ 1595
पितृभ्यां प्रस्थिते साध्वी पतिमिंगितकोविदा।
नित्यं पर्यचरत्प्रीत्या भवानीव भवं प्रभुम्॥ १
श्रीमैत्रेयजीने कहा—विदुरजी! माता-पिताके चले जानेपर पतिके अभिप्रायको समझ लेनेमें कुशल साध्वी देवहूति कर्दमजीकी प्रतिदिन प्रेमपूर्वक सेवा करने लगी, ठीक उसी तरह, जैसे श्रीपार्वतीजी भगवान् शंकरकी सेवा करती हैं॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.23.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 345) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/23/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)