॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.23.2
विश्रम्भेणात्मशौचेन गौरवेण दमेन च।
शुश्रूषया सौहृदेन वाचा मधुरया च भोः॥ २
viśrambheṇātmaśaucena gauraveṇa damena ca|
śuśrūṣayā sauhṛdena vācā madhurayā ca bhoḥ|| 2
अर्थ
उसने काम-वासना, दम्भ, द्वेष, लोभ, पाप और मदका त्यागकर बड़ी सावधानी और लगनके साथ सेवामें तत्पर रहकर विश्वास, पवित्रता, गौरव, संयम, शुश्रूषा, प्रेम और मधुरभाषणादि गुणोंसे अपने परम तेजस्वी पतिदेवको सन्तुष्ट कर लिया॥ २-३॥✎ 1595