वह सभी ऋतुओंमें सुखदायक था और उसमें जहाँ-तहाँ सब प्रकारकी दिव्य सामग्रियाँ रखी हुई थीं तथा उसे चित्र-विचित्र रेशमी झंडियों और पताकाओंसे खूब सजाया गया था॥ १४॥
दिव्योपकरणोपेतं सर्वकालसुखावहम्।
पट्टिकाभिः पताकाभिर्विचित्राभिरलंकृतम्॥ १४
वह सभी ऋतुओंमें सुखदायक था और उसमें जहाँ-तहाँ सब प्रकारकी दिव्य सामग्रियाँ रखी हुई थीं तथा उसे चित्र-विचित्र रेशमी झंडियों और पताकाओंसे खूब सजाया गया था॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.23.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 347) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/23/14/