॥ श्रीहरिः ॥
द्वाःसु२ विद्रुमदेहल्या भातं वज्रकपाटवत्।
शिखरेष्विन्द्रनीलेषु हेमकुम्भैरधिश्रितम्॥ १८
dvāḥsu vidrumadehalyā bhātaṃ vajrakapāṭavat|
śikhareṣvindranīleṣu hemakumbhairadhiśritam|| 18
अर्थ
मूँगेकी ही देहलियाँ थीं। उसके द्वारोंमें हीरेके किवाड़ थे तथा इन्द्रनील मणिके शिखरोंपर सोनेके कलश रखे हुए थे॥ १८॥
द्वाःसु विद्रुमदेहल्या भातं वज्रकपाटवत्।
शिखरेष्विन्द्रनीलेषु हेमकुम्भैरधिश्रितम्॥ १८
मूँगेकी ही देहलियाँ थीं। उसके द्वारोंमें हीरेके किवाड़ थे तथा इन्द्रनील मणिके शिखरोंपर सोनेके कलश रखे हुए थे॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.23.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 347) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/23/18/टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—द्वाःस्थविद्रु०।
(मुद्रित पृष्ठ 347)