श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.23.20

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

हंसपारावतव्रातैस्तत्र तत्र नि१कूजितम्।

कृत्रिमान् म२न्यमानैः स्वानधिरुह्याधिरुह्य च॥ २०

haṃsapārāvatavrātaistatra tatra nikūjitam|

kṛtrimān manyamānaiḥ svānadhiruhyādhiruhya ca|| 20

अर्थ

उस विमानमें जहाँ-तहाँ कृत्रिम हंस और कबूतर आदि पक्षी बनाये गये थे, जो बिलकुल सजीव-से मालूम पड़ते थे; उन्हें अपना सजातीय समझकर बहुत-से हंस और कबूतर उनके पास बैठ-बैठकर अपनी बोली बोलते थे॥ २०॥ उसमें सुविधानुसार क्रीडास्थली, शयनगृह, बैठक, आँगन और चौक आदि बनाये गये थे—जिनके कारण वह विमान स्वयं कर्दमजीको भी विस्मित-सा कर रहा था॥ २१॥

यह व्याख्या श्लोक 3.23.20 से 3.23.21 तककी एक साथ है।

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—विकू।

    (मुद्रित पृष्ठ 348)
  2. २

    प्रा० पा०—सविमानांश्‍च समन्तादधिरुह्य।

    (मुद्रित पृष्ठ 348)

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