श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.23.45

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

तस्मिन् विमान उत्कृष्टां शय्यां रतिकरीं श्रिता।

न चाबुध्यत तं कालं पत्यापीच्येन संगता॥ ४५

tasmin vimāna utkṛṣṭāṃ śayyāṃ ratikarīṃ śritā|

na cābudhyata taṃ kālaṃ patyāpīcyena saṃgatā|| 45

अर्थ

उस विमानमें रतिसुखको बढ़ानेवाली बड़ी सुन्दर शय्याका आश्रय ले अपने परम रूपवान् प्रियतमके साथ रहती हुई देवहूतिको इतना काल कुछ भी न जान पड़ा॥ ४५॥

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