श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.23.52

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

ब्रह्मन्दुहितृभिस्तुभ्यं विमृग्याः पतयः समाः।

कश्चित्स्यान्मे विशोकाय त्वयि प्रव्रजिते वनम्॥ ५२

brahmanduhitṛbhistubhyaṃ vimṛgyāḥ patayaḥ samāḥ|

kaścitsyānme viśokāya tvayi pravrajite vanam|| 52

अर्थ

ब्रह्मन्! इन कन्याओंके लिये योग्य वर खोजने पड़ेंगे और आपके वनको चले जानेके बाद मेरे जन्म-मरणरूप शोकको दूर करनेके लिये भी कोई होना चाहिये॥ ५२॥

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