ब्रह्मन्! इन कन्याओंके लिये योग्य वर खोजने पड़ेंगे और आपके वनको चले जानेके बाद मेरे जन्म-मरणरूप शोकको दूर करनेके लिये भी कोई होना चाहिये॥ ५२॥
ब्रह्मन्दुहितृभिस्तुभ्यं विमृग्याः पतयः समाः।
कश्चित्स्यान्मे विशोकाय त्वयि प्रव्रजिते वनम्॥ ५२
ब्रह्मन्! इन कन्याओंके लिये योग्य वर खोजने पड़ेंगे और आपके वनको चले जानेके बाद मेरे जन्म-मरणरूप शोकको दूर करनेके लिये भी कोई होना चाहिये॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.23.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 351) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/23/52/