श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.24.18

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

एष मानवि ते गर्भं प्रविष्टः कैटभार्दनः।

अविद्यासंशयग्रन्थिं छित्त्वा गां विचरिष्यति॥ १८

eṣa mānavi te garbhaṃ praviṣṭaḥ kaiṭabhārdanaḥ|

avidyāsaṃśayagranthiṃ chittvā gāṃ vicariṣyati|| 18

अर्थ

[फिर देवहूतिसे बोले—] राजकुमारी! सुनहरे बाल, कमल-जैसे विशाल नेत्र और कमलांकित चरण-कमलोंवाले शिशुके रूपमें कैटभासुरको मारनेवाले साक्षात् श्रीहरिने ही, ज्ञान-विज्ञानद्वारा कर्मोंकी वासनाओंका मूलोच्छेदन करनेके लिये, तेरे गर्भमें प्रवेश किया है। ये अविद्याजनित मोहकी ग्रन्थियोंको काटकर पृथ्वीमें स्वच्छन्द विचरेंगे॥ १७-१८॥✎ 309 1596

यह अर्थ श्लोक 17–18 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #309 शब्दोंके बीचका स्थान: बाल,कमल-जैसे → बाल, कमल-जैसे
  • #1596 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: निष्कपट-भावसे → निष्कपटभावसे

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