॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.24.17
ज्ञानविज्ञानयोगेन कर्मणामुद्धरन् जटाः।
हिरण्यकेशः पद्माक्षः पद्ममुद्रापदाम्बुजः॥ १७
jñānavijñānayogena karmaṇāmuddharan jaṭāḥ|
hiraṇyakeśaḥ padmākṣaḥ padmamudrāpadāmbujaḥ|| 17
अर्थ
[फिर देवहूतिसे बोले—] राजकुमारी! सुनहरे बाल, कमल-जैसे विशाल नेत्र और कमलांकित चरण-कमलोंवाले शिशुके रूपमें कैटभासुरको मारनेवाले साक्षात् श्रीहरिने ही, ज्ञान-विज्ञानद्वारा कर्मोंकी वासनाओंका मूलोच्छेदन करनेके लिये, तेरे गर्भमें प्रवेश किया है। ये अविद्याजनित मोहकी ग्रन्थियोंको काटकर पृथ्वीमें स्वच्छन्द विचरेंगे॥ १७-१८॥✎ 309 1596