श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.24.40

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

मात्र आध्यात्मिकीं विद्यां शमनीं सर्वकर्मणाम्।

वितरिष्ये यया चासौ भयं चातितरिष्यति॥ ४०

mātra ādhyātmikīṃ vidyāṃ śamanīṃ sarvakarmaṇām|

vitariṣye yayā cāsau bhayaṃ cātitariṣyati|| 40

अर्थ

माता देवहूतिको भी मैं सम्पूर्ण कर्मोंसे छुड़ानेवाला आत्मज्ञान प्रदान करूँगा जिससे यह संसाररूप भयसे पार हो जायगी॥ ४०॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें