श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.24.45

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

वासुदेवे भगवति सर्वज्ञे प्रत्यगात्मनि।

परेण भक्तिभावेन लब्धात्मा मुक्तबन्धनः॥ ४५

vāsudeve bhagavati sarvajñe pratyagātmani|

pareṇa bhaktibhāvena labdhātmā muktabandhanaḥ|| 45

अर्थ

परम भक्तिभावके द्वारा सर्वान्तर्यामी सर्वज्ञ श्रीवासुदेवमें चित्त स्थिर हो जानेसे वे सारे बन्धनोंसे मुक्त हो गये॥ ४५॥✎ 312

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #312 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को

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