॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.25.18
ज्ञानवैराग्ययुक्तेन भक्तियुक्तेन चात्मना।
परिपश्यत्युदासीनं प्रकृतिं च हतौजसम्॥ १८
jñānavairāgyayuktena bhaktiyuktena cātmanā|
paripaśyatyudāsīnaṃ prakṛtiṃ ca hataujasam|| 18
अर्थ
तब जीव अपने ज्ञान-वैराग्य और भक्तिसे युक्त हृदयसे आत्माको प्रकृतिसे परे, एकमात्र (अद्वितीय), भेदरहित, स्वयंप्रकाश, सूक्ष्म, अखण्ड और उदासीन (सुख-दुःखशून्य) देखता है तथा प्रकृतिको शक्तिहीन अनुभव करता है॥ १७-१८॥ योगियोंके लिये भगवत्प्राप्तिके निमित्त सर्वात्मा श्रीहरिके प्रति की हुई भक्तिके समान और कोई मंगलमय मार्ग नहीं है॥ १९॥ विवेकीजन संग या आसक्तिको ही आत्माका अच्छेद्य बन्धन मानते हैं; किन्तु वही संग या आसक्ति जब संतों—महापुरुषोंके प्रति हो जाती है तो मोक्षका खुला द्वार बन जाती है॥ २०॥