श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.25.30

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

तदेतन्मे विजानीहि यथाहं मन्दधीर्हरे।

सुखं बुद्ध्येय दुर्बोधं योषा भवदनुग्रहात्॥ ३०

tadetanme vijānīhi yathāhaṃ mandadhīrhare|

sukhaṃ buddhyeya durbodhaṃ yoṣā bhavadanugrahāt|| 30

अर्थ

हरे! यह सब आप मुझे इस प्रकार समझाइये जिससे कि आपकी कृपासे मैं मन्दमति स्त्रीजाति भी इस दुर्बोध विषयको सुगमतासे समझ सकूँ॥ ३०॥

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