श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.25.31

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

विदित्वार्थं कपिलो मातुरित्थं

जातस्नेहो यत्र तन्वाभिजातः।

तत्त्वाम्नायं यत्प्रवदन्ति सांख्यं

प्रोवाच१ वै भक्तिवितानयोगम्॥ ३१

viditvārthaṃ kapilo māturitthaṃ

jātasneho yatra tanvābhijātaḥ|

tattvāmnāyaṃ yatpravadanti sāṃkhyaṃ

provāca vai bhaktivitānayogam|| 31

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! जिसके शरीरसे उन्होंने स्वयं जन्म लिया था, उस अपनी माताका ऐसा अभिप्राय जानकर कपिलजीके हृदयमें स्नेह उमड़ आया और उन्होंने प्रकृति आदि तत्त्वोंका निरूपण करनेवाले शास्त्रका, जिसे सांख्य कहते हैं, उपदेश किया। साथ ही भक्ति-विस्तार एवं योगका भी वर्णन किया॥ ३१॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—प्रावोचद्वै।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 360)

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