श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.25.33

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

अनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी।

जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा॥ ३३

animittā bhāgavatī bhaktiḥ siddhergarīyasī|

jarayatyāśu yā kośaṃ nigīrṇamanalo yathā|| 33

अर्थ

श्रीभगवान्‌ने कहा—माता! जिसका चित्त एकमात्र भगवान्‌में ही लग गया है, ऐसे मनुष्यकी वेदविहित कर्मोंमें लगी हुई तथा विषयोंका ज्ञान करानेवाली (कर्मेन्द्रिय एवं ज्ञानेन्द्रिय—दोनों प्रकारकी) इन्द्रियोंकी जो सत्त्वमूर्ति श्रीहरिके प्रति स्वाभाविकी प्रवृत्ति है, वही भगवान्‌की अहैतुकी भक्ति है। यह मुक्तिसे भी बढ़कर है; क्योंकि जठरानल जिस प्रकार खाये हुए अन्‍नको पचाता है, उसी प्रकार यह भी कर्मसंस्कारोंके भण्डाररूप लिंगशरीरको तत्काल भस्म कर देती है॥ ३२-३३॥✎ 314 315 316

यह अर्थ श्लोक 32–33 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #314 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #315 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #316 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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