श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.25.34

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

नैकात्मतां मे स्पृहयन्ति केचिन्-

मत्पादसेवाभिरता मदीहाः।

येऽन्योन्यतो भागवताः प्रसज्य ✎ 1885

सभाजयन्ते मम पौरुषाणि॥ ३४

naikātmatāṃ me spṛhayanti kecin-

matpādasevābhiratā madīhāḥ|

ye'nyonyato bhāgavatāḥ prasajya

sabhājayante mama pauruṣāṇi|| 34

अर्थ

मेरी चरणसेवामें प्रीति रखनेवाले और मेरी ही प्रसन्‍नताके लिये समस्त कार्य करनेवाले कितने ही बड़भागी भक्त, जो एक-दूसरेसे मिलकर प्रेमपूर्वक मेरे ही पराक्रमोंकी चर्चा किया करते हैं, मेरे साथ एकीभाव (सायुज्यमोक्ष) की भी इच्छा नहीं करते॥ ३४॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1885 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): प्रसज्ज्य → प्रसज्य

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