श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.2

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

ज्ञानं निःश्रेयसार्थाय पुरुषस्यात्मदर्शनम्।

यदाहुर्वर्णये तत्ते हृदयग्रन्थिभेदनम्॥ २

jñānaṃ niḥśreyasārthāya puruṣasyātmadarśanam|

yadāhurvarṇaye tatte hṛdayagranthibhedanam|| 2

अर्थ

आत्मदर्शनरूप ज्ञान ही पुरुषके मोक्षका कारण है और वही उसकी अहंकाररूप हृदयग्रन्थिका छेदन करनेवाला है, ऐसा पण्डितजन कहते हैं। उस ज्ञानका मैं तुम्हारे आगे वर्णन करता हूँ॥ २॥✎ 317

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #317 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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