॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.26.21
यत्तत्सत्त्वगुणं स्वच्छं शान्तं भगवतः पदम्।
यदाहुर्वासुदेवाख्यं चित्तं तन्महदात्मकम्॥ २१
yattatsattvaguṇaṃ svacchaṃ śāntaṃ bhagavataḥ padam|
yadāhurvāsudevākhyaṃ cittaṃ tanmahadātmakam|| 21
अर्थ
जो सत्त्वगुणमय, स्वच्छ, शान्त और भगवान्की उपलब्धिका स्थानरूप चित्त है, वही महत्तत्त्व है और उसीको ‘वासुदेव’ कहते हैं*॥ २१॥ जिस प्रकार पृथ्वी आदि अन्य पदार्थोंके संसर्गसे पूर्व जल अपनी स्वाभाविक (फेन-तरंगादिरहित) अवस्थामें अत्यन्त स्वच्छ, विकारशून्य एवं शान्त होता है, उसी प्रकार अपनी स्वाभाविकी अवस्थाकी दृष्टिसे स्वच्छत्व, अविकारित्व और शान्तत्व ही वृत्तियोंसहित चित्तका लक्षण कहा गया है॥ २२॥ तदनन्तर भगवान्की वीर्यरूप चित्-शक्तिसे उत्पन्न हुए महत्तत्त्वके विकृत होनेपर उससे क्रिया-शक्तिप्रधान अहंकार उत्पन्न हुआ। वह वैकारिक, तैजस और तामस भेदसे तीन प्रकारका है। उसीसे क्रमशः मन, इन्द्रियों और पंचमहाभूतोंकी उत्पत्ति हुई॥ २३-२४॥ इस भूत, इन्द्रिय और मनरूप अहंकारको ही पण्डितजन साक्षात् ‘संकर्षण’ नामक सहस्र सिरवाले अनन्तदेव कहते हैं॥ २५॥ इस अहंकारका देवतारूपसे कर्तृत्व, इन्द्रियरूपसे करणत्व और पंचभूतरूपसे कार्यत्व लक्षण है तथा सत्त्वादि गुणोंके सम्बन्धसे शान्तत्व, घोरत्व और मूढत्व भी इसीके लक्षण हैं॥ २६॥ उपर्युक्त तीन प्रकारके अहंकारमेंसे वैकारिक अहंकारके विकृत होनेपर उससे मन हुआ, जिसके संकल्प-विकल्पोंसे कामनाओंकी उत्पत्ति होती है॥ २७॥ यह मनस्तत्त्व ही इन्द्रियोंके अधिष्ठाता ‘अनिरुद्ध’ के नामसे प्रसिद्ध है। योगिजन शरत्कालीन नीलकमलके समान श्याम वर्णवाले इन अनिरुद्धजीकी शनैः-शनैः मनको वशीभूत करके आराधना करते हैं॥ २८॥ ✎ 319 320
टिप्पणियाँ
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जिसे अध्यात्ममें चित्त कहते हैं; उसीको अधिभूतमें महत्तत्त्व कहा जाता है। चित्तमें अधिष्ठाता ‘क्षेत्रज्ञ’ और उपास्यदेव ‘वासुदेव’ हैं। इसी प्रकार अहंकारमें अधिष्ठाता ‘रुद्र’ और उपास्यदेव ‘संकर्षण’ है, बुद्धिमें अधिष्ठाता ‘ब्रह्मा’ और उपास्यदेव ‘प्रद्युम्न’ है तथा मनमें अधिष्ठाता ‘चन्द्रमा’ और उपास्यदेव ‘अनिरुद्ध’ है।