श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.22

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

स्वच्छत्वमविकारित्वं शान्तत्वमिति चेतसः।

वृत्तिभिर्लक्षणं प्रोक्तं यथापां प्रकृतिः परा॥ २२

svacchatvamavikāritvaṃ śāntatvamiti cetasaḥ|

vṛttibhirlakṣaṇaṃ proktaṃ yathāpāṃ prakṛtiḥ parā|| 22

अर्थ

जिस प्रकार पृथ्वी आदि अन्य पदार्थोंके संसर्गसे पूर्व जल अपनी स्वाभाविक (फेन-तरंगादिरहित) अवस्थामें अत्यन्त स्वच्छ, विकारशून्य एवं शान्त होता है, उसी प्रकार अपनी स्वाभाविकी अवस्थाकी दृष्टिसे स्वच्छत्व, अविकारित्व और शान्तत्व ही वृत्तियोंसहित चित्तका लक्षण कहा गया है॥ २२॥✎ 319 320

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #319 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #320 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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