श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.33

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

अर्थाश्रयत्वं शब्दस्य द्रष्टुर्लिंगत्वमेव च।

तन्मात्रत्वं च नभसो लक्षणं कवयो विदुः॥ ३३

arthāśrayatvaṃ śabdasya draṣṭurliṃgatvameva ca|

tanmātratvaṃ ca nabhaso lakṣaṇaṃ kavayo viduḥ|| 33

अर्थ

अर्थका प्रकाशक होना, ओटमें खड़े हुए वक्ताका भी ज्ञान करा देना और आकाशका सूक्ष्म रूप होना—विद्वानोंके मतमें यही शब्दके लक्षण हैं॥ ३३॥✎ 321

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #321 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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