॥ श्रीहरिः ॥
भूतानां छिद्रदातृत्वं बहिरन्तरमेव च।
प्राणेन्द्रियात्मधिष्ण्यत्वं नभसो वृत्तिलक्षणम्॥ ३४
bhūtānāṃ chidradātṛtvaṃ bahirantarameva ca|
prāṇendriyātmadhiṣṇyatvaṃ nabhaso vṛttilakṣaṇam|| 34
अर्थ
भूतोंको अवकाश देना, सबके बाहर-भीतर वर्तमान रहना तथा प्राण, इन्द्रिय और मनका आश्रय होना—ये आकाशके वृत्ति (कार्य) रूप लक्षण हैं॥ ३४॥✎ 321
भूतानां छिद्रदातृत्वं बहिरन्तरमेव च।
प्राणेन्द्रियात्मधिष्ण्यत्वं नभसो वृत्तिलक्षणम्॥ ३४
भूतोंको अवकाश देना, सबके बाहर-भीतर वर्तमान रहना तथा प्राण, इन्द्रिय और मनका आश्रय होना—ये आकाशके वृत्ति (कार्य) रूप लक्षण हैं॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 365) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/26/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #321 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की