श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.38

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

वायोश्‍च स्पर्शतन्मात्राद्रूपं दैवेरितादभूत्।

समुत्थितं ततस्तेजश्‍चक्षू रूपोपलम्भनम्॥ ३८

vāyośca sparśatanmātrādrūpaṃ daiveritādabhūt|

samutthitaṃ tatastejaścakṣū rūpopalambhanam|| 38

अर्थ

तदनन्तर दैवकी प्रेरणासे स्पर्शतन्मात्रविशिष्ट वायुके विकृत होनेपर उससे रूपतन्मात्र हुआ तथा उससे तेज और रूपको उपलब्ध करानेवाली नेत्रेन्द्रियका प्रादुर्भाव हुआ॥ ३८॥

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