॥ श्रीहरिः ॥
वायोश्च स्पर्शतन्मात्राद्रूपं दैवेरितादभूत्।
समुत्थितं ततस्तेजश्चक्षू रूपोपलम्भनम्॥ ३८
vāyośca sparśatanmātrādrūpaṃ daiveritādabhūt|
samutthitaṃ tatastejaścakṣū rūpopalambhanam|| 38
अर्थ
तदनन्तर दैवकी प्रेरणासे स्पर्शतन्मात्रविशिष्ट वायुके विकृत होनेपर उससे रूपतन्मात्र हुआ तथा उससे तेज और रूपको उपलब्ध करानेवाली नेत्रेन्द्रियका प्रादुर्भाव हुआ॥ ३८॥
वायोश्च स्पर्शतन्मात्राद्रूपं दैवेरितादभूत्।
समुत्थितं ततस्तेजश्चक्षू रूपोपलम्भनम्॥ ३८
तदनन्तर दैवकी प्रेरणासे स्पर्शतन्मात्रविशिष्ट वायुके विकृत होनेपर उससे रूपतन्मात्र हुआ तथा उससे तेज और रूपको उपलब्ध करानेवाली नेत्रेन्द्रियका प्रादुर्भाव हुआ॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 365) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/26/38/