॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.26.39
द्रव्याकृतित्वं गुणता व्यक्तिसंस्थात्वमेव च।
तेजस्त्वं तेजसः साध्वि रूपमात्रस्य वृत्तयः॥ ३९
dravyākṛtitvaṃ guṇatā vyaktisaṃsthātvameva ca|
tejastvaṃ tejasaḥ sādhvi rūpamātrasya vṛttayaḥ|| 39
अर्थ
साध्वि! वस्तुके आकारका बोध कराना, गौण होना—द्रव्यके अंगरूपसे प्रतीत होना, द्रव्यका जैसा आकार-प्रकार और परिमाण आदि हो, उसी रूपमें उपलक्षित होना तथा तेजका स्वरूपभूत होना—ये सब रूपतन्मात्रकी वृत्तियाँ हैं॥ ३९॥