॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.26.42
कषायो मधुरस्तिक्तः कट्वम्ल इति नैकधा।
भौतिकानां विकारेण रस एको विभिद्यते॥ ४२
kaṣāyo madhurastiktaḥ kaṭvamla iti naikadhā|
bhautikānāṃ vikāreṇa rasa eko vibhidyate|| 42
अर्थ
रस अपने शुद्ध स्वरूपमें एक ही है; किन्तु अन्य भौतिक पदार्थोंके संयोगसे वह कसैला, मीठा, तीखा, कड़वा, खट्टा और नमकीन आदि कई प्रकारका हो जाता है॥ ४२॥