॥ श्रीहरिः ॥
रूपमात्राद्विकुर्वाणात्तेजसो दैवचोदितात्।
रसमात्रमभूत्तस्मादम्भो जिह्वा रसग्रहः॥ ४१
rūpamātrādvikurvāṇāttejaso daivacoditāt|
rasamātramabhūttasmādambho jihvā rasagrahaḥ|| 41
अर्थ
फिर दैवकी प्रेरणासे रूपतन्मात्रमय तेजके विकृत होनेपर उससे रसतन्मात्र हुआ और उससे जल तथा रसको ग्रहण करानेवाली रसनेन्द्रिय (जिह्वा) उत्पन्न हुई॥ ४१॥
रूपमात्राद्विकुर्वाणात्तेजसो दैवचोदितात्।
रसमात्रमभूत्तस्मादम्भो जिह्वा रसग्रहः॥ ४१
फिर दैवकी प्रेरणासे रूपतन्मात्रमय तेजके विकृत होनेपर उससे रसतन्मात्र हुआ और उससे जल तथा रसको ग्रहण करानेवाली रसनेन्द्रिय (जिह्वा) उत्पन्न हुई॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 366) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/26/41/