॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.26.45
करम्भपूतिसौरभ्यशान्तोग्राम्लादिभिः पृथक्।
द्रव्यावयववैषम्याद्गन्ध एको विभिद्यते॥ ४५
karambhapūtisaurabhyaśāntogrāmlādibhiḥ pṛthak|
dravyāvayavavaiṣamyādgandha eko vibhidyate|| 45
अर्थ
गन्ध एक ही है; तथापि परस्पर मिले हुए द्रव्यभागोंकी न्यूनाधिकतासे वह मिश्रितगन्ध, दुर्गन्ध, सुगन्ध, मृदु, तीव्र और अम्ल (खट्टा) आदि अनेक प्रकारका हो जाता है॥ ४५॥