॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.26.46
भावनं ब्रह्मणः स्थानं धारणं सद्विशेषणम्।
सर्वसत्त्वगुणोद्भेदः पृथिवीवृत्तिलक्षणम्॥ ४६
bhāvanaṃ brahmaṇaḥ sthānaṃ dhāraṇaṃ sadviśeṣaṇam|
sarvasattvaguṇodbhedaḥ pṛthivīvṛttilakṣaṇam|| 46
अर्थ
प्रतिमादि रूपसे ब्रह्मकी साकार-भावनाका आश्रय होना, जल आदि कारणतत्त्वोंसे भिन्न किसी दूसरे आश्रयकी अपेक्षा किये बिना ही स्थित रहना, जल आदि अन्य पदार्थोंको धारण करना, आकाशादिका अवच्छेदक होना (घटाकाश, मठाकाश आदि भेदोंको सिद्ध करना) तथा परिणामविशेषसे सम्पूर्ण प्राणियोंके [स्त्रीत्व, पुरुषत्व आदि] गुणोंको प्रकट करना—ये पृथ्वीके कार्यरूप लक्षण हैं॥ ४६॥