आकाशका विशेष गुण शब्द जिसका विषय है, वह श्रोत्रेन्द्रिय है; वायुका विशेष गुण स्पर्श जिसका विषय है, वह त्वगिन्द्रिय है॥ ४७॥
नभोगुणविशेषोऽर्थो यस्य तच्छ्रोत्रमुच्यते।
वायोर्गुणविशेषोऽर्थो यस्य तत्स्पर्शनं विदुः॥ ४७
आकाशका विशेष गुण शब्द जिसका विषय है, वह श्रोत्रेन्द्रिय है; वायुका विशेष गुण स्पर्श जिसका विषय है, वह त्वगिन्द्रिय है॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 366) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/26/47/