श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.5

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

गुणैर्विचित्राः सृजतीं सरूपाः प्रकृतिं प्रजाः।

विलोक्य मुमुहे सद्यः स इह ज्ञानगूहया॥ ५

guṇairvicitrāḥ sṛjatīṃ sarūpāḥ prakṛtiṃ prajāḥ|

vilokya mumuhe sadyaḥ sa iha jñānagūhayā|| 5

अर्थ

लीलापरायण प्रकृति अपने सत्त्वादि गुणोंद्वारा उन्हींके अनुरूप प्रजाकी सृष्टि करने लगी; यह देख पुरुष ज्ञानको आच्छादित करनेवाली उसकी आवरणशक्तिसे मोहित हो गया, अपने स्वरूपको भूल गया॥ ५॥✎ 317

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #317 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें