इस प्रकार अपनेसे भिन्न प्रकृतिको ही अपना स्वरूप समझ लेनेसे पुरुष प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जानेवाले कर्मोंमें अपनेको ही कर्ता मानने लगता है॥ ६॥✎ 317
एवं पराभिध्यानेन कर्तृत्वं प्रकृतेः पुमान्।
कर्मसु क्रियमाणेषु गुणैरात्मनि मन्यते॥ ६
इस प्रकार अपनेसे भिन्न प्रकृतिको ही अपना स्वरूप समझ लेनेसे पुरुष प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जानेवाले कर्मोंमें अपनेको ही कर्ता मानने लगता है॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 362) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/26/6/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#317 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने