इस कर्तृत्वाभिमानसे ही अकर्ता, स्वाधीन, साक्षी और आनन्दस्वरूप पुरुषको जन्म-मृत्युरूप बन्धन एवं परतन्त्रताकी प्राप्ति होती है॥ ७॥✎ 317
तदस्य संसृतिर्बन्धः पारतन्त्र्यं च तत्कृतम्।
भवत्यकर्तुरीशस्य साक्षिणो निर्वृतात्मनः॥ ७
इस कर्तृत्वाभिमानसे ही अकर्ता, स्वाधीन, साक्षी और आनन्दस्वरूप पुरुषको जन्म-मृत्युरूप बन्धन एवं परतन्त्रताकी प्राप्ति होती है॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 362) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/26/7/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#317 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने