॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.26.50
एतान्यसंहत्य यदा महदादीनि सप्त वै।
कालकर्मगुणोपेतो जगदादिरुपाविशत्॥ ५०
etānyasaṃhatya yadā mahadādīni sapta vai|
kālakarmaguṇopeto jagadādirupāviśat|| 50
अर्थ
जब महत्तत्त्व, अहंकार और पंचभूत—ये सात तत्त्व परस्पर मिल न सके—पृथक्-पृथक् ही रह गये, तब जगत्के आदिकारण श्रीनारायणने काल, अदृष्ट और सत्त्वादि गुणोंके सहित उनमें प्रवेश किया॥ ५०॥