श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.51

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

ततस्तेनानुविद्धेभ्यो युक्तेभ्योऽण्डमचेतनम्।

उत्थितं पुरुषो यस्मादुदतिष्ठदसौ विराट्॥ ५१

tatastenānuviddhebhyo yuktebhyo'ṇḍamacetanam|

utthitaṃ puruṣo yasmādudatiṣṭhadasau virāṭ|| 51

अर्थ

फिर परमात्माके प्रवेशसे क्षुब्ध और आपसमें मिले हुए उन तत्त्वोंसे एक जड अण्ड उत्पन्‍न हुआ। उस अण्डसे इस विराट् पुरुषकी अभिव्यक्ति हुई॥ ५१॥ इस अण्डका नाम विशेष है, इसीके अन्तर्गत श्रीहरिके स्वरूपभूत चौदहों भुवनोंका विस्तार है। यह चारों ओरसे क्रमशः एक-दूसरेसे दसगुने जल, अग्‍नि, वायु, आकाश, अहंकार और महत्तत्त्व—इन छः आवरणोंसे घिरा हुआ है। इन सबके बाहर सातवाँ आवरण प्रकृतिका है॥ ५२॥ कारणमय जलमें स्थित उस तेजोमय अण्डसे उठकर उस विराट् पुरुषने पुनः उसमें प्रवेश किया और फिर उसमें कई प्रकारके छिद्र किये॥ ५३॥ सबसे पहले उसमें मुख प्रकट हुआ, उससे वाक्-इन्द्रिय और उसके अनन्तर वाक्का अधिष्ठाता अग्‍नि उत्पन्‍न हुआ। फिर नाकके छिद्र (नथुने) प्रकट हुए, उनसे प्राणसहित घ्राणेन्द्रिय उत्पन्‍न हुई॥ ५४॥ घ्राणके बाद उसका अधिष्ठाता वायु उत्पन्‍न हुआ। तत्पश्चात् नेत्रगोलक प्रकट हुए, उनसे चक्षु-इन्द्रिय प्रकट हुई और उसके अनन्तर उसका अधिष्ठाता सूर्य उत्पन्‍न हुआ। फिर कानोंके छिद्र प्रकट हुए, उनसे उनकी इन्द्रिय श्रोत्र और उसके अभिमानी दिग्देवता प्रकट हुए॥ ५५॥

यह व्याख्या श्लोक 3.26.51 से 3.26.55 तककी एक साथ है।

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