श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.59

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

नाड्योऽस्य निरभिद्यन्त ताभ्यो लोहितमाभृतम्१।

नद्यस्ततः समभवन्‍नुदरं निरभिद्यत॥ ५९

nāḍyo'sya nirabhidyanta tābhyo lohitamābhṛtam|

nadyastataḥ samabhavannudaraṃ nirabhidyata|| 59

अर्थ

इसी प्रकार जब विराट् पुरुषके नाडियाँ प्रकट हुईं, तो उनसे रुधिर उत्पन्‍न हुआ और उससे नदियाँ हुईं। फिर उसके उदर (पेट) प्रकट हुआ॥ ५९॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—माश्रितम्।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 368)

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