॥ श्रीहरिः ॥
क्षुत्पिपासे ततः स्यातां समुद्रस्त्वेतयोरभूत्।
अथास्य हृदयं भिन्नं हृदयान्मन उत्थितम्॥ ६०
kṣutpipāse tataḥ syātāṃ samudrastvetayorabhūt|
athāsya hṛdayaṃ bhinnaṃ hṛdayānmana utthitam|| 60
अर्थ
उससे क्षुधा-पिपासाकी अभिव्यक्ति हुई और फिर उदरका अभिमानी समुद्रदेवता उत्पन्न हुआ। तत्पश्चात् उसके हृदय प्रकट हुआ, हृदयसे मनका प्राकट्य हुआ॥ ६०॥
क्षुत्पिपासे ततः स्यातां समुद्रस्त्वेतयोरभूत्।
अथास्य हृदयं भिन्नं हृदयान्मन उत्थितम्॥ ६०
उससे क्षुधा-पिपासाकी अभिव्यक्ति हुई और फिर उदरका अभिमानी समुद्रदेवता उत्पन्न हुआ। तत्पश्चात् उसके हृदय प्रकट हुआ, हृदयसे मनका प्राकट्य हुआ॥ ६०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.60 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 368) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/26/60/